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जानें, भगवान शिव के विभिन्न रूपों के बारे में
भगवान शिव हिंदु धर्म के सबसे महत्वपूर्ण देवी-देवताओं में से एक है। भगवान शिव के अनुयायी उन्हें सर्वोच्च शक्ति मानते हैं।
भगवान शिव हिंदु धर्म के सबसे महत्वपूर्ण देवी-देवताओं में से एक है। भगवान शिव के अनुयायी उन्हें सर्वोच्च शक्ति मानते हैं। ’ओंकार’ या फिर अस्तित्व से पहले प्रकट हुई ध्वनि को भगवान शिव की उत्पत्ति माना जाता है।
हालांकि, हिंदु पौराणिक कथाओं में भगवान के सबसे पहले रूप का ज़िक्र आने पर विरोधाभास है, क्योंकि शैव ऐसा मानते हैं कि शिव ही भगवान का सबसे पहला स्वरूप है।
ब्रह्मांड में प्रकट होने वाला पहला और सबसे शक्तिशाली अस्तित्व होने के कारण भगवान शिव निराकार, लिंगहीन और असीम है। भगवान शिव पंचतत्वों की अध्यक्षता करते हैं जो पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रकृति के ये सभी रूप शिवलिंग में अवस्थित है।
शिवलिंग भगवान शिव का सबसे आम प्रतिनिधि है। शिवपुराण में भगवान शिव के कुल 64 रूपों का वर्णन किया गया है। इनमें से अधिकांश के बारे में आम आदमी नहीं जानता है। यहां हमने भगवान शिव के 6 सबसे दिलचस्प स्वरूपों को सूचीबद्ध किया है।

लिंगोद्भव
लिंगोद्भव या 'अथाह' भगवान शिव का एक रूप है जो माघ महीने में कृष्णचतुर्दशी के दिन देखा जा सकता है। लिंगोद्भव भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को यह दिखाने के लिए प्रकट होता है कि भगवान शिव ही परम आध्यात्मिक स्वरूप है। पौराणिक कथाओं में लिंगोद्भव का वर्णन प्रकाश की एक अंतहीन किरण के रूप में किया गया है।
मंदिरों में लिंगोद्भव की छवि को सीधी खड़ी हुई चतुर्भुज मुर्ति के रूप में देखा जा सकता है। इस मूर्ति में एक हिरण है और उपरी भुजा में एक कुल्हाड़ी है। शेष दो भुजाएं आपे भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में है। यह छवि अकसर शिव मंदिरों की पश्चिमी दीवारें पर देखी जाती है।

नटराज
नटराज या 'नृत्य के राजा' भगवान शिव को नृत्य करते हुए रूप में दर्शाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव विनाश के भगवान है और यह स्वरूप जीवन और मृत्यु चक्र की लय को दर्शाने वाला है।
जब भगवान शिव विनाश का नृत्य करते हैं, तो उसे 'तांडवनृत्य कहा जाता है' और इसमें जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का सार है। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव नृत्य करते हैं, तो बिजली चमकती है, विशाल लहरें उठती हैं, विषैले नाग विष निकालते हैं और सब कुछ आग में भस्म हो जाता है। जब भगवान सृजन का नृत्य करते हैं तो उसे 'आनंदनृत्य' कहते हैं। यह ब्रह्मांड को शांत और समृद्ध बनाता है।

दक्षिणमूर्ति
दक्षिणमूर्ति अथवा 'दक्षिण का भगवान', ज्ञान औा सत्य का भगवान है। दक्षिणमूर्ति की छवि भगवान शिव के मंदिरों की दक्षिणी दीवारों पर चित्रित की जाती है। इस छवि में भगवान एक बरगद के पेड़ के नीचे एक आसन पर विराजमान है।
उनका बायां पैर मुड़ा हुआ है और दायां पैर लटका हुआ है जो कि एक 'अपसमार'नामक राक्षस पर रखा हुआ है। उनके हाथ में एक त्रिशूल, एक सांप और ताड़ का एक पत्ता है। उनका दाहिना प्रकोष्ठ शुभ चिन्मुद्रा से सुसज्ज्ति है।

अर्धनारीश्वर
भगवान शिव और देवी शक्ति जीवन के सृजन को दर्शाने के लिए अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट होते है। यह स्वरूप अकसर एक खड़ी प्रतिमा के रूप में दर्शाया जाता है जो आधा नर और आधी नारी है। यह दुनिया को यह सिखाता है कि नर और नारी एकदूसरे के पूरक बल हैं तथा कोई लिंग दूसरे से बड़ा नहीं है।

गंगाधर
गंगाधर का शाब्दिक अर्थ है गंगा को धारण करने वाला। ऐया कहा जाता है कि जब राजा भगीरथ देवी गंगा की आकाश से आने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तो उसने अंत्रिहकार से कहा कि वह इतने वेग के साथ आएगी कि सारी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। भगीरथ के अनुरोध करने पर भगवान शिव ने उसे अपने जटाओं में धारण किया और पृथ्वी पर एसे गंगा नदी के रूप में छोड़ दिया। और इस प्रकार देवी गंगा का अहंकार समाप्त हो गया।

भिक्षातन
भिक्षातन का शाब्दिक अर्थ है भिक्षा मांगना। लेकिन भगवान शिव का भिक्षातन रूप अहंकार और अज्ञानता को दूर करने के लिए है। इस रूप् में भगवान शिव को नग्न और उत्तेजक रूप में दिखाया गया है। वह एक चतुर्भुज साधु के रूप में है जिसके तीन हाथें में त्रिशूल, डमरू और एक खोपड़ी है। उनके दाहिने हाथ की कलाई से एक हरिणी को खिलाते हुए दिखाया गया है।



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