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क्यों बिना बालक के कन्या पूजन अधूरा माना जाता है? लांगुर न मिले तो क्या करें?
Shardiya Navratri Kanya Pujan Langur Importance: 22 सितंबर 2025 से शारदीय नवरात्रि शुरू हो गए हैं और अब कन्या पूजन का दिन करीब आ गया है। दरअसल नवरात्रि के दौरान अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन छोटी-छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कन्या पूजन के साथ-साथ एक बालक जिसे लांगुर कहा जाता है को भी बुलाकर पूजा जाता है? दरअसल, शास्त्रों के अनुसार कन्या पूजन तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक उसमें एक बालक की पूजा न की जाए।
इसके पीछे की वजह भी बहुत खास है जिसका शास्त्रों में वर्णन किया गया है। कई बार भक्तों की टेंशन बढ़ जाती है जब कन्या पूजन के दौरान लांगुर न मिले। ऐसे में सवाल ये उठता है कि इस स्थिति में क्या करना चाहिए? आइए जानते हैं कन्या पूजन में लांगुर की अहमियत और यदि न मिले तो कौन-से विकल्प अपना सकते हैं साथ ही बालक को लांगुर क्यों कहा जाता है?
कन्या पूजन में लांगुर का महत्व
कन्या पूजन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना है।
लांगुर यानी बालक, शक्ति के साथ वीरता और सुरक्षा का प्रतीक है।
शास्त्रों में लांगुर को भगवान भैरव और हनुमान जी का प्रतीक माना गया है।
इसीलिए कन्या भोज तभी पूर्ण माना जाता है जब कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराया जाए।

क्यों अधूरा माना जाता है कन्या पूजन बिना लांगुर के?
मान्यता है कि जहां कन्याएं शक्ति का रूप हैं, वहीं लांगुर उनकी रक्षा का प्रतीक है।
ऐसा कहा जाता है कि देवी मां की पूजा बटुक नाथ या लांगुर के बिना अधूरी होती है।
कन्या पूजन में बालक को बटुक भैरव नाथ के रूप में पूजा जाता है।
शक्ति और वीरता के संगम से ही पूजा पूर्ण होती है।
लांगुर के बिना कन्या पूजन अधूरा और अपूर्ण माना जाता है।
बालक को लांगुर क्यों कहा जाता है?
नवरात्रि के दौरान अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन छोटी-छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर पूजित किया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है। लेकिन इसके साथ ही एक बालक की पूजा भी की जाती है, जिसे परंपरा में "लांगुर" कहा जाता है। लांगुर शब्द वास्तव में "लंगूर" से लिया गया है, जो भगवान हनुमान जी का रूप माना जाता है। मान्यता है कि जैसे हनुमान जी माता दुर्गा के परम भक्त और शक्ति की रक्षा करने वाले हैं, वैसे ही कन्या पूजन में लांगुर बालक हनुमान या भैरव का प्रतीक होता है। यही कारण है कि कन्या भोज तभी पूर्ण माना जाता है जब कन्याओं के साथ एक लांगुर को भी भोजन कराया जाए। लेकिन कई बार पूजा के समय लांगुर उपलब्ध नहीं होता, ऐसे में क्या करना चाहिए? आइए जानते हैं इसके धार्मिक महत्व और शास्त्रों में बताए उपाय।
लांगुर न मिले तो क्या करें?
यदि पूजा के समय लांगुर न मिले तो किसी छोटे भाई, भतीजे या पड़ोस के बालक को बुलाकर पूजन करें। अगर आसपास बालक उपलब्ध न हो, तो भगवान हनुमान जी की मूर्ति या चित्र का पूजन करके कन्या पूजन पूर्ण किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में कन्याओं की संख्या 9 रखने पर भी लांगुर की आवश्यकता नहीं मानी जाती। कन्या पूजन में बच्चों को हलवा चना और पूरी का प्रसाद दें और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना सबसे जरूरी माना गया है।
कब है अष्टमी-नवमी का कन्या पूजन?
इस बार नवरात्रि पूरे दस दिन की हैं। 22 सितंबर से शारदीय नवरात्रि शुरू हुए और 2 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। ऐसे में लोगों का सवाल है कि अष्टमी और नवमी का कन्या पूजन कब किया जाएगा? हिंदू पंचांग के अनुसार, 29 सितंबर शाम 4 बजकर 31 मिनट से 30 सितंबर की शाम 6 बजकर 6 मिनट तक अष्टमी तिथि है। उदया तिथि के अनुसार, 30 सितंबर को अष्टमी कन्या पूजन किया जाएगा। वहीं 30 सितंबर शाम को 6 बजकर 6 मिनट से 1 अक्टूबर शाम 7 बजकर 1 मिनट तक नवमी तिथि रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, 1 अक्टूबर को नवमी का कन्या पूजन किया जाएगा।



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